वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी बलिदान दिवस विशेष, “रामगढ़ की रानी अवंती बाई “

वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी बलिदान दिवस विशेष 

रामगढ़ की रानी अवंती बाई 

 

आलेख डॉ. विजय चौरसिया गाड़ासरई जिला डिंडौरी म.प्र.

स्वतंत्रता का मूल्य प्राणाहुति है। भारत को भी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये महान बलिदान और दीर्घ एवं कठिन संघर्ष करना पड़ा. भारतीय इतिहास में सन् 1857 की क्रांति का महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकी पहली बार भारतीयों ने एकत्र होकर अंग्रेजी शासन का अंत करने के लिये अपना रक्त बहाकर अजादी का इतिहास लिखा जो बलिदान की प्रेरणाप्रद रोमांचकारी घटनाओं से भरा पड़ा है। बहादुर वीरों ने हंसते हुये आजादी की बलिवेदी पर अपने प्राण न्यौछावर किये वहाँ वीरांगनायें भी पीछे नहीं रहीं और उन्होंने भारत की बलिदानी परंपरा को फिर से ताजा कर दिया। इस प्रकार स्वधीनता संग्राम में जिन वीरांगनाओं ने अंग्रेजों के विरुद्ध शस्त्र उठाये थे, उनमें डिन्डौरी जिले में रामगढ़ की रानी अवंती बाई ने बड़े शौर्य और साहस के साथ क्रांति का शंखनाद किया। जब गढ़ा मण्डला के राजा शंकरशाह को अंग्रेज द्वारा तोप के मुंह से बांधकर उड़ा देने के समाचार रानी अवंती बाई को मिला तो विद्रोह का ज्वालामुखी फूट पड़ा।

 

वीरांगना रानी अवंती बाई लोधी का जन्म 16 अगस्त 1831 को ग्राम मनखेड़ो जिला सिवनी मध्यप्रदेश में हुआ था। इनकी माता का नाम कृष्णा बाई व पिता का नाम राव जुझार सिंह था। इनके पिता जमींदार थे। बाल्यावस्था से ही वीर तथा साहसी अवंती बाई ने बचपन से ही तलवारबाजी, घुड़सवारी सीख लिया था।

 

डिन्डौरी जिला के रामगढ़ के राज्य की स्थापना राजा गज सिंह ने की थी। गज सिंह के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र राजसिंह गद्दी पर बैठे। राज सिंह के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र विक्रमादित्य सिंह सिंहासन पर विराजमान हुये, बचपन में ही विकमादित्य सिंह का विवाह मनकेड़ी जिला सिवनी के राव जुझार सिंह की कन्या के साथ हुआ। ससुराल में आने के बाद उस कन्या का नाम अवंती बाई रखा गया। गद्दी पर बैठने के थोड़े दिन बाद ही विकमादित्य सिंह मानसिक रुप से अस्वस्थ्य हो गये। विकमादित्य सिंह के दो बेटे थे। अमान सिंह और शेर सिंह जो उस समय नाबालिग थे। अवंती बाई ने अपने अस्वस्थ्य पति और अल्प व्यस्क अत्तराधिकारी अमान सिंह की ओर से राज्य कार्य संभाला। परंतु अंग्रेजी कंपनी ने अमान सिंह के नाबालिग होने का बहाना लेकर रामगढ़ की रियासत कोर्ट आफ वार्ड ले ली वहाँ पर अपना पदाधिकारी बैठा दिया।

 

सन् 1857 की राज्य क्रांति से कुछ समय पूर्व सार उत्तरी भारत में क्रांति में सम्मिलित होन का आव्हान करने के लिये लाला कमल का फूल और रोटी भेजी गई थी। यह क्रांति संदेश रानी अवंती बाई को भी मिला। रानी अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विस्तार के अनरुप लार्ड डलहौजी की देशी राज्यों को हड़पने के कुचक्र एवं षड्यंत्र के परिणाम स्वरुप रामगढ़ राज्य को कोर्ट आफ वार्डस के हाथों सौंप देने के कारण बेहद क्षुब्ध थीं। उनके हृदय में क्रांति की ज्वाला धधक रही थी। रानी ने जागीरदारों और मालगुजारों को अपने हाथ का लिखा पत्र भिजवाया। जिसमें लिखा था कि “देश के लिये मरो या चूड़ियाँ पहनो तुमको धर्म ईमान की सौगंध है, जो इस कागज का पत्ता बैरी को दो” रानी के इस आव्हान का लोगों पर भारी प्रभाव पड़ा। शाहपुर के मालगुजार ठाकुर जगत सिंह ने नारायणगंज थाने को घेर लिया। बहादुर सिंह लोधी ने

शाहपुर में मोर्चा लगाया। स्लीमनाबाद में अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। वे पाटन जाकर सुबेदार बलदेव तिवारी से मिल गये।

 

मेजर इरस्किन ने जो जबलपुर डिवीजन का अंग्रेज कमिशनर था। वह प्रति सप्ताह घटनाओं का व्यौरा पत्र द्वारा कंपनी राज्य को भेजता था। उसने जबलपुर पत्र व्यवहार केस फाइल क्रमांक 10 और 33/1857 में लिखा है कि राजा शंकर शाह की मृत्यू से क्रद्ध एवं अपमानित लगभग 4000 विद्रोही रामगढ़ की विधवा रानी अवंती बाई तथा बिजराघवगढ़ के राजा सूरज प्रसाद के कुशल नेतृत्व में नर्मदा नदी के सम्पूर्ण उत्तरी प्रदेश में सशस्त्र विद्रोह के लिये एकत्रित हो गये हैं। इसके पूर्व क्रांतिकारियों ने अनेक स्थानों पर कंपनी राज्य के ठिकानों पर आक्रमण किये थे। रानी अवंतीबाई ने एक बड़ी सैनिक टोली का नेतृत्व कर मंड़ला पर अधिपत्य करने के प्रयोजन से मंड़ला से एक किलोमीटर पूर्व खैरी नामक ग्राम में मोर्चा जमाया। अंग्रेजी सेना से यहीं रानी की पहली मुठभेड़ हुयी। जिसमें सेनापति वाडिंगटन अपमानजनक रुप से पराजित हुआ। रानी की तलवार के एक ही वार से उसका घोड़ा दो टुकड़े हो गया तथा वांडिंगटन रानी से प्राणों की भीख मांगकर भाग गया।

 

अपनी पराजय का बदला लेने के लिये उसने जोरदार तैयारी की और अंग्रेज सैनिक टुकड़ियों को संगठित कर एकत्रित किया। छापामार युद्ध का उपयोग कर उसने सर्वप्रथम विजराघवगढ़ पर सैनिक विजय प्राप्त कर अधिकार जमाया और उसके बाद पाटन, संग्रामपुर, स्लीमनाबाद, नारायणगंज, और घुघरी पर कब्जा कर लिया।

 

जब मंडला की अंग्रेज सेना रामगढ़ की ओर बढ़ी और उन्होंने दोनों ओर से रामगढ़ पर आक्रमण कर दिया। रानी अवंतीबाई ने स्थिति की भयंकरता को देखकर रामगढ़ को खाली कर दिया और देवहारगढ़ की पहाड़ियों पर चली गयीं। रानी ने घने जंगल में पहाड़ी पर अतयंत साहस के साथ युद्ध व्यूह की रचना की। उस समय रानी ने अंग्रेज सैनिकों के साथ भयंकर युद्ध किया। अंत में अंग्रेज सेना का एक आक्रमण इतना भयंकर हुआ की रानी देश भक्त सैनिकों सहित बुरी तरह घिर गयीं। जब रानी ने देखा कि उसका पकड़ा जाना सुनिश्चत है, तब रानी ने वीरांगनाओं की गौरवशाली परम्पराओं के अनुरुप बंदी होने की अपेक्षा मृत्यू को श्रेष्टतर समझा और 20 मार्च 1858 को क्षण मात्र में अपने घोडे से उतरकर अपने हाथ की तलवार से अपना प्राणान्त कर लिया। उनको जीवित रखने खने का बहुत प्रयास किया गया किन्तू उसकी आत्मा को बंदी न रखा जा सका। विजेताओं के हाथ में रानी का निर्जीव शरीर ही आया। अपनी प्रसिद्ध पूर्वज रानी दुर्गावती के समान रण क्षेत्र में अंतिम क्षण तक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुये वीरगति प्राप्त की। रानी ने मुट्ठी भर देशभक्त सैनिकों के साथ जिस अलौकिक वीरता असाधारण युद्ध कौशल के साथ उन्होंने मृत्यू को वरण किया वह इतिहास के विरले उदाहरण में एक है। रानी ने मरते समय कहा था कि उसने स्वयं ही जनता को क्रांती के लिये प्रेरित किया था। जनता का इसमें कोई दोष नहीं है। अतः अंग्रेजों ने रामगढ रियासत की जनता पर अत्याचार तो नहीं किये पर रानी के उत्तराधिकारियों उनके बेटों अमान सिंह और शेर सिंह को जो पेंशन दी गयी वह जनता से ही बढ़े हुये लगान के रुप में वसूल की जाती रही। इस बढ़े हुये लगान से एकत्रित राशि को परवरिश कहा जाता था।

रानी अवंती बाई लोधी का साहस, वीरता, प्रजावत्सल शासन, स्वाभिमान, नेतृत्व क्षमता तथा मातृभूमि प्रेम सदैव अनुकरणीय रहेगा। भारत सरकार के द्वारा रानी अवंती बाई लोधी के सम्मान में सन् 1986 एवं सन् 2001 में डाक टिकट जारी किए हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने जबलपुर में स्थित बरगी बांध का नाम रानी अवंती बाई के नाम पर रानी अवंती बाई लोधी सागर बांध एवं 2024 में रानी अवंती बाई लोधी की याद में सागर में रानी अवंती बाई लोधी विश्वविघालय की स्थापना की।

 

आलेख. डॉ. विजय चौरसिया गाड़ासरई जिला डिंडौरी म.प्र

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