
शहपुरा उत्कृष्ट विद्यालय प्राचार्य की कार्यप्रणाली पर सवाल, भ्रष्टाचार की फाइलों के बीच RTI कार्यकर्ता को फंसाने की साजिश का आरोप

शहपुरा डिण्डौरी। जिले के शिक्षा विभाग में इन दिनों ‘भ्रष्टाचार और षड्यंत्र’ की चर्चाएं जोरों पर हैं। शासकीय उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय शहपुरा के प्राचार्य डॉ डीके श्रीवास्तव की कार्यप्रणाली एक बार फिर विवादों के घेरे में है। ताजा मामला सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारियों को दबाने और जानकारी मांगने वाले कार्यकर्ता को ही कथित तौर पर झूठे मामलों में फंसाने की साजिश से जुड़ा है। विभाग के भीतर दबी आवाज में यह चर्चा आम है कि पद की लालसा और राजनीतिक रसूख का हवाला देकर विभाग के ही कुछ लोगों को लामबंद करने का खेल खेला जा रहा है।
दबाव की राजनीति और लामबंदी का खेल
विकास खंड शिक्षा विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि प्राचार्य खुद को राजनीतिक रूप से प्रभावशाली बताकर अपने अधीनस्थ संकुल प्राचार्यों को अपने पक्ष में एकजुट कर रहे हैं। चर्चा है कि अधीनस्थ अधिकारी उनके दबाव में हैं, जिसके चलते आरटीआई कार्यकर्ता के खिलाफ बनावटी शिकायतें तैयार करने की रणनीति बनाई जा रही है। विभाग के ही निष्पक्ष अधिकारियों का मानना है कि आरटीआई के तहत जानकारी देना एक वैधानिक प्रक्रिया है; यदि संस्थान का कामकाज पारदर्शी है, तो जानकारी सार्वजनिक करने में इतनी आपत्ति क्यों है?

पुराने भ्रष्टाचार ने बढ़ाई मुश्किलें
प्राचार्य का विवादों से पुराना नाता रहा है। वर्ष 2014-15 में अपनी पुत्री को नियम विरुद्ध तरीके से मेधावी छात्र लैपटॉप योजना का ₹25,000 लाभ दिलाने का मामला आज भी विभाग की फाइलों में दर्ज है। तब जांच में यह सिद्ध हुआ था कि उनकी पुत्री राजस्थान के कोटा में कोचिंग कर रही थी, जबकि उन्हें कागजों में स्थानीय स्कूल में उपस्थित बताकर सरकारी राशि का गबन किया गया। कमिश्नर द्वारा दोषी पाए जाने के बाद उक्त राशि सरकारी खजाने में वापस जमा करानी पड़ी थी। वर्तमान में जानकारी छिपाने की प्रवृत्ति यह संकेत दे रही है कि विद्यालय में भ्रष्टाचार की जड़ें और भी गहरी हो सकती हैं।

‘भ्रष्टाचार उजागर होने के डर से मुझे फंसा रहे हैं’
इस पूरे प्रकरण पर आरटीआई कार्यकर्ता मनीष साहू ने सीधे तौर पर प्राचार्य की मंशा पर सवाल उठाए हैं। साहू का कहना है, “हमने उत्कृष्ट विद्यालय में हुई वित्तीय अनियमितताओं के संबंध में विशिष्ट जानकारियां चाही हैं। प्राचार्य द्वारा जानकारी न देना स्पष्ट करता है कि व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ है। अब अपनी गर्दन फंसती देख वे मुझे झूठे आरोपों में फंसाने का षड्यंत्र रच रहे हैं। यदि निष्पक्ष जांच हो जाए, तो यह फिर से पुराने मामलों की तरह ही दोषी पाए जाएंगे।”
शिक्षा विभाग के मौन पर उठते सवाल
इस खींचतान के बीच शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों की चुप्पी भी संदेह पैदा कर रही है। एक ओर शासन पारदर्शिता की बात करता है, वहीं दूसरी ओर एक जिम्मेदार पद पर बैठा व्यक्ति सूचना साझा करने के बजाय शिकायतकर्ता को ही निशाना बनाने में लगा है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग इस लामबंदी और भ्रष्टाचार के आरोपों पर क्या कड़ा रुख अख्तियार करता है।
नगरवासियों ने खोला मोर्चा, निष्पक्ष जांच की मांग
प्राचार्य की विवादित कार्यप्रणाली और एक ही व्यक्ति के पास दोहरे प्रभार को लेकर नगरवासियों में भारी आक्रोश है। स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। लोगों का कहना है कि स्थानांतरण के बावजूद शाहपुरा में जमे रहना और आरटीआई के नियमों का उल्लंघन करना यह सिद्ध करता है कि कहीं न कहीं राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इन गंभीर आरोपों पर क्या कार्रवाई करता है या फिर ‘रसूख’ के आगे नियम बौने साबित होंगे।